कोई चाँद चेहरा हमारा न होगा
तो इस शहर-ए-नौ में गुज़ारा न होगा
इसी इक गुमाँ ने परिंदों को मारा
कि इस आसमाँ का किनारा न होगा
ये महरूमियाँ हैं या फंदा है मेरा
तुम्हें तो तग़ाफ़ुल ने मारा न होगा
अरे 'ख़्वाब' जी बे-वक़ूफ़ी भली है
कि दानाइयों से गुज़ारा न होगा
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