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ओम निश्चल: ये जो बच्चे हैं, ज़मींदार की औलाद नहीं

उर्दू अदब
                
                                                         
                            सुनो इन्हें भी जो सड़कों पे अभी छाए हैं 
                                                                 
                            
ये सभी लोग किसी ग्रह से नहीं आए हैं

ये अभी दौर-ए-हक़ीकत से नावाकिफ़ हैं 
कि इनके बीच भेड़िए भी उतर आए हैं 

ये जो बच्चे हैं, ज़मींदार की औलाद नहीं 
ज़मीन बेच के तन काट के पढ़ पाए हैं 

दिन-ब-दिन हो रहे हालत बुरे चौतरफा 
मगर ये लोग अभी तक नहीं घबराये हैं 

इन्होंने वर्षों तालीम में झोंकी है उमर 
धूप, बारिश औ' पसीने से ये नहाए हैं 

कोई तो पूछे कभी हाल इनके दिल का भी 
कि किस क़दर ये अंधेरे में सर उठाए हैं

जवाब देने की आदत नहीं  है राजा को 
ये लोग फिर भी सवालों को सर उठाए हैं

इन्हें उजाड़ो नहीं साम-दाम छल-बल से 
भले ये सच है कि सत्ता से ये टकराये हैं

आपकी मर्जी आप कैसे देखते हैं इन्हें
कसूर इनका कि हक़ मांगने ये आए हैं 

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23 घंटे पहले

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