आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

मिला कर ख़ाक में फिर ख़ाक को बर्बाद करते हैं - लाला माधव राम जौहर

lala madhav ram jauhar ghazal mila kar khaaq mein phir khaaq ko
                
                                                         
                            

मिला कर ख़ाक में फिर ख़ाक को बर्बाद करते हैं
ग़रीबों पर सितम क्या किया सितम-ईजाद करते हैं

हज़ारों दिल जला कर ग़ैर का दिल शाद करते हैं
मिटा कर सैकड़ों शहर एक घर आबाद करते हैं

मोअज़्ज़िन को भी वो सुनते नहीं नाक़ूस तो क्या है
अबस शैख़ ओ बरहमन हर तरफ़ फ़रियाद करते हैं

हसीनों की मोहब्बत का न कर कुछ ए'तिबार ऐ दिल
ये ज़ालिम किस के होते हैं ये किस को याद करते हैं

वही शागिर्द फिर हो जाते हैं उस्ताद ऐ 'जौहर'
जो अपने जान ओ दिल से ख़िदमत-ए-उस्ताद करते हैं

5 वर्ष पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर