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मुनीर नियाज़ी: मैं बस की खिड़कियों से ये तमाशे देख लेता हूँ

muneer niyazi famous ghazal thake logon ko majboori main chalte dekh leta hoon
                
                                                         
                            


थके लोगों को मजबूरी में चलते देख लेता हूँ
मैं बस की खिड़कियों से ये तमाशे देख लेता हूँ

कभी दिल में उदासी हो तो उन में जा निकलता हूँ
पुराने दोस्तों को चुप से बैठे देख लेता हूँ

छुपाते हैं बहुत वो गर्मी-ए-दिल को मगर मैं भी
गुल-ए-रुख़ पर उड़ी रंगत के छींटे देख लेता हूँ

खड़ा हूँ यूँ किसी ख़ाली क़िले के सेहन-ए-वीराँ में
कि जैसे मैं ज़मीनों में दफ़ीने देख लेता हूँ

'मुनीर' अंदाज़ा-ए-क़ार-ए-फ़ना करना हो जब मुझ को
किसी ऊँची जगह से झुक के नीचे देख लेता हूँ

2 दिन पहले

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