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शहज़ाद क़ैस की ग़ज़ल: हुस्न वाले वो काम करते हैं

उर्दू अदब
                
                                                         
                            हुस्न वाले वो काम करते हैं
                                                                 
                            
लफ़्ज़ झुक कर सलाम करते हैं

उम्र भर ये ग़ुलाम न समझा
आप कैसे ग़ुलाम करते हैं

ख़ुश-नसीबी गुलों पे ख़त्म हुई
उन की ज़ुल्फ़ों में शाम करते हैं

क़िस्सा-ए-इश्क़ आगे बढ़ न सका
वो मिरा एहतिराम करते हैं

बा-अदब बा-मुलाहिज़ा घर में
अब कबूतर क़याम करते हैं

फ़तवा ता'बीर पर है लागू हुज़ूर
ख़्वाब को क्यों हराम करते हैं

जाम तो तोड़ बैठे मिम्बर पर
अब सुबू को इमाम करते हैं

चार ख़ाने बनाए बैठा है
दिल तिरा इंतिज़ाम करते हैं

सब शुरूअ' करते हैं ब-नाम-ए-ख़ुदा
हम ख़ुदा पर तमाम करते हैं

बिन मिले जिन से 'क़ैस' इश्क़ हुआ
ये ग़ज़ल उन के नाम करते हैं

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11 घंटे पहले

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