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शहज़ाद क़ैस की ग़ज़ल: मोहब्बत रात की रानी का हल्का सर्द झोंका है

उर्दू अदब
                
                                                         
                            मोहब्बत इक समुंदर है ज़रा से दिल के अंदर है
                                                                 
                            
ज़रा से दिल के अंदर है मगर पूरा समुंदर है

मोहब्बत रात की रानी का हल्का सर्द झोंका है
मोहब्बत तितलियों का गुल को छू लेने का मंज़र है

मोहब्बत बाग़बाँ के हाथ की मिट्टी को कहते हैं
रुख़-ए-गुल के मुताबिक़ ख़ाक ये सोने से बेहतर है

जहान-ए-नौ जिसे महबूब की आँखों का हासिल हो
फ़क़ीह-ए-इश्क़ के फ़तवे की रू से वो सिकंदर है

मोहब्बत जू-ए-शीर-ए-कुन मोहब्बत सलसबील-ए-हक़
मोहब्बत अब्र-ए-रहमत है मोहब्बत हौज़-ए-कौसर है

मोहब्बत चाँद के हमराह तारे गिनते रहना है
मोहब्बत शबनमी आँचल मोहब्बत दामन-ए-तर है

कोई दुनिया में न भी हो पहुँच में है मोहब्बत की
बदन से मावराई है मोहब्बत रूह-परवर है

मोहब्बत है रमी शक पर मोहब्बत तौफ़-ए-महबूबी
सफ़ा मर्वा ने समझाया मोहब्बत हज्ज-ए-अकबर है

अगर तुम लौटना चाहो सफ़ीना उस को कर लेना
अगर तुम डूबना चाहो मोहब्बत इक समुंदर है

सुनो 'शहज़ाद-क़ैस' आख़िर सभी कुछ मिटने वाला है
मगर इक ज़ात जो मुश्क-ए-मोहब्बत से मोअ'त्तर है

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16 घंटे पहले

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