दिन बीतते रहे और एक दिन वो भी आया
जब देह की देहरी लांघ गई उलझन
गली के नुक्कड़ से दाहिने हाथ मुड़ कर आठवें मकान में
एक कहानी ने जन्म लिया
और एक लड़की दुपट्टे से लटक गई
एक मौत ने दूसरी जिंदगी को बुलाया
और शाम होते होते
एक लड़का शहर के पुराने पुल से
एक कविता और एक ख़त छोड़ कर कूद गया
ख़बर सबको थी
पर ख़बर नहीं बनी
प्रेम में तीसरा कोण कसाई का ठीहा होता है
और जरूरी नहीं कि
हर बार वहां कोई लड़का या लड़की हो
समाज भी होता है
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