समीक्षक- विनोद पाठक
भारतीय राष्ट्रबोध की निर्मिति केवल भूगोल, शासन-प्रणालियों या राजनीतिक संरचनाओं से नहीं होती। उसकी वास्तविक आत्मा संस्कृति में निवास करती है और इस संस्कृति की केंद्रीय धुरी सदैव नारी रही है, मां के रूप में, साधिका के रूप में, विचारक के रूप में तथा राष्ट्रजीवन की मौन किंतु सशक्त निर्मात्री के रूप में। “भारतीय दृष्टि में नारी चिंतन” शीर्षक यह ग्रंथ इसी सांस्कृतिक सत्य को वैचारिक स्तर पर पुनर्स्थापित करने का एक गंभीर और विचारोत्तेजक प्रयास है।
आधुनिक काल में नारी विमर्श प्रायः अधिकार, अस्मिता और संघर्ष की भाषा में अभिव्यक्त होता है। इन प्रश्नों का महत्व निर्विवाद है, किंतु जब विमर्श केवल प्रतिक्रिया तक सीमित हो जाता है, तब वह समाज को जोड़ने के बजाय कई बार विभाजन की दिशा में भी ले जा सकता है। इसके विपरीत यह ग्रंथ भारतीय परंपरा में निहित उस दृष्टि को सामने लाता है, जहाँ नारी और पुरुष को परस्पर विरोधी नहीं, बल्कि एक-दूसरे के पूरक के रूप में देखा गया है, शक्ति और शिव के अविभाज्य संबंध की भांति।
वेदों की गार्गी और मैत्रेयी से लेकर औपनिषदिक ब्रह्मवादिनी परंपरा तक, रामायण और महाभारत की स्त्री-चेतना से लेकर बौद्ध और जैन परंपराओं की करुणा-साधना तक-भारतीय दर्शन और इतिहास में नारी की भूमिका सदैव सृजनात्मक, निर्णायक और मूल्य-निर्माता रही है। भक्ति काल में मीरा की निर्भीक आस्था और आधुनिक काल में अहिल्याबाई होलकर जैसी सक्षम प्रशासक स्त्रियां इस परंपरा की सशक्त कड़ियां हैं। यह पुस्तक इन सभी आयामों को किसी भावनात्मक आग्रह या अतिरंजना के बिना, शास्त्रीय संदर्भों और वैचारिक प्रमाणों के साथ प्रस्तुत करती है।
ज्ञान गंगा प्रकाशन द्वारा प्रकाशित 272 पृष्ठों के इस ग्रंथ में देश के प्रतिष्ठित चिंतकों, शिक्षाविदों, कुलपतियों, संतों तथा वैचारिक नेतृत्व से जुड़े व्यक्तियों के कुल 42 आलेख संकलित हैं। पुस्तक के संपादक बिरेन्द्र पाण्डेय ने विविध वैचारिक पृष्ठभूमियों से आए इन विचारों को एक सुसंगत सूत्र में पिरोते हुए यह सुनिश्चित किया है कि ग्रंथ का समग्र स्वर भारतीय जीवन-दृष्टि से विचलित न हो। संपादन में यह स्पष्ट दृष्टिगोचर होता है कि नारी चिंतन को किसी एक वैचारिक खांचे में सीमित करने के बजाय उसकी बहुआयामी उपस्थिति को भारतीय बोध के आलोक में प्रस्तुत किया गया है।
इस ग्रंथ की एक उल्लेखनीय विशेषता यह है कि यह न तो पश्चिमी नारीवाद की अनुकरणात्मक प्रस्तुति करता है और न ही उसे पूर्णतः अस्वीकार करने की प्रतिक्रिया में उलझता है। इसके स्थान पर यह भारतीय परंपरा में निहित संतुलन, समन्वय और समग्रता के सिद्धांत को केंद्र में रखता है। यहाँ नारी को न तो केवल पीड़िता के रूप में देखा गया है और न ही आदर्शीकरण की अतिशयोक्ति में प्रस्तुत किया गया है, बल्कि उसे जीवन-प्रवाह की एक सक्रिय, रचनात्मक और उत्तरदायी शक्ति के रूप में समझने का प्रयास किया गया है।
यह पुस्तक नारी चिंतन को राष्ट्रजीवन से पृथक नहीं करती। परिवार, समाज और राष्ट्र, तीनों के सांस्कृतिक संस्कार नारी के माध्यम से पीढ़ी-दर-पीढ़ी प्रवाहित होते हैं। जब नारी का आत्मबोध सशक्त होता है, तब राष्ट्र का आत्मबोध भी स्वाभाविक रूप से सुदृढ़ होता है। यह ग्रंथ इसी तथ्य को वैचारिक स्पष्टता और दार्शनिक गहराई के साथ रेखांकित करता है।
समग्र रूप से “भारतीय दृष्टि में नारी चिंतन” नारी विमर्श पर लिखी गई कोई सामान्य पुस्तक नहीं है, बल्कि यह भारतीय राष्ट्रबोध के सांस्कृतिक आयाम का स्मरण और पुनर्पाठ करने वाला एक महत्वपूर्ण वैचारिक दस्तावेज़ है। यह उन पाठकों के लिए विशेष रूप से उपयोगी है जो नारी प्रश्न को केवल समकालीन बहसों तक सीमित न रखकर, भारतीय परंपरा और राष्ट्रजीवन के व्यापक संदर्भ में समझना चाहते हैं। इस अर्थ में यह पुस्तक अध्ययन की ही नहीं, बल्कि आत्ममंथन और वैचारिक पुनर्संतुलन की भी प्रेरणा देती है।
20 घंटे पहले
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