तुम्हारी आंखों का काजल हूं
एक आवारा बादल हूं मैं।
मेरे लफ़्ज़ों का ऐतबार तो कर,
एक प्यासा सावन हूं मैं।
लाल पुष्प हूं तुम्हारे
केशों में गुंथा-सा,
जो खुशबू बन कर
महक जाता सांसों में।
जब कोई पुरवा
मादक-सी बही जब,
तेरे होठों पर गीत बन
उतर जाता हूं मैं।
उन गीतों में बसा
एक तराना हूं मैं,
तुम जिसका जिक्र
न कर पाई कभी
वही अफसाना हूं मैं।
-राकेश धर द्विवेदी
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