द मैन हू रीड एवरीथिंगः द लिटरेरी लेटर्स ऑफ हेरोल्ड ब्लूम
संपादक : हीथर कैस व्हाइट
वह आदमी, जिसने सब कुछ पढ़ डाला
हाल ही में प्रकाशित यह चर्चित पुस्तक बताती है कि ब्लूम शुरू से ही साहित्य के बहुत बड़े शौकीन थे। उन्होंने नौ साल की उम्र में ही मोबी-डिक किताब पढ़ ली थी। वह एक घंटे में 400 पन्ने की किताब पढ़ सकते थे।
कई लेखक जो बाद में आलोचक बन गए, उन्हें खुद समझ नहीं आया कि ऐसा कैसे हुआ। हेरोल्ड ब्लूम (1930-2019), जो एक दबंग, उभरते हुए व मिलनसार विद्वान और साहित्यिक आलोचक थे, को भी खुद को समझने में समय लगा। उन्होंने 1975 में कवि और येल इंग्लिश डिपार्टमेंट के साथी जॉन हॉलैंडर को लिखा, ‘भगवान जानता है कि मैं क्या हूं। कवि, आलोचक, विद्वान, इतिहासकार, मनोविश्लेषक, दार्शनिक या थियोसोफिस्ट नहीं, बल्कि इनका एक बेकार मिश्रण।’
20वीं सदी के उत्तरार्ध में अमेरिकी साहित्य पर ब्लूम का जो प्रभाव पड़ा, उसे शब्दों में बयां करना मुश्किल है। उनके बाद कोई भी साहित्य समीक्षक उनकी बराबरी नहीं कर पाया। उनकी किताबें, जिनमें द वेस्टर्न कैनन (1994) भी शामिल है, बेस्टसेलर बनी और उन्होंने ऐसी बौद्धिक बहसें छेड़ दीं, जिनकी आग आज भी सुलग रही है। ब्लूम को खुद की बुराई करना पसंद था। वह उदासी से जूझ रहे थे और कभी-कभी खुद को कमतर बताकर तारीफ व तसल्ली पाने की कोशिश करते थे। ब्लूम शुरू से ही साहित्य के बहुत बड़े शौकीन थे। उन्होंने नौ साल की उम्र में ही मोबी-डिक किताब पढ़ ली थी। वह एक घंटे में 400 पन्ने की किताब पढ़ सकते थे। डिनर के बाद पार्टी में वह खेल के तौर पर पैराडाइज लॉस्ट की पंक्तियां सुनाना पसंद करते थे।
ब्लूम की चिट्ठियों की यह नई किताब, द मैन हू रीड एवरीथिंग शुरू से आखिर तक शानदार है और जैसा कि वह खुद कहते थे, यह काफी उत्साह बढ़ाने वाली है। हालांकि, चुनी गई चिट्ठियां जान-बूझकर उनकी जिंदगी के बजाय उनके काम पर ज्यादा केंद्रित हैं, फिर भी वे उनकी बुद्धि के एक ज्यादा जमीनी और कम औपचारिक पहलू को दिखाती हैं। द मैन हू रीड एवरीथिंग में ब्लूम के सिर्फ आठ पत्र-मित्रों का जिक्र है। वे उनकी तारीफ करके उन्हें खुश करते थे। जो उन्हें पसंद थे, उनके लिए वह कभी एजेंट, तो कभी संपादक, कभी विंस लोम्बार्डी, तो कभी चीयरलीडर की भूमिका निभाते थे।
किताब की संपादक, हीथर कैस व्हाइट ब्लूम की छात्र रह चुकी हैं। इस किताब में बहुत ज्यादा निजी बातें तो नहीं हैं, पर कुछ हैं जरूर। वह लिखते हैं कि कैसे देर शाम को आग के पास कुर्सी पर बैठकर वह पढ़ते थे और पास में स्पेनिश ब्रांडी ‘फंडाडोर’ का एक गिलास रखा होता था। कभी-कभी वह अपनी सेहत से जुड़ी दिक्कतों का भी जिक्र करते हैं। कई चिट्ठियों में उदासी के दौर का जिक्र है, जिसे ब्लूम ने ‘पुरानी निराशा, खुद को धोखा देना और अपनी ही धुन में मग्न रहना’ कहा था। ब्लूम के ले गुइन को लिखे पत्र मानवीय और दिल को छू लेने वाले हैं। एक पत्र में वह गिरकर कूल्हे की हड्डी टूटने का जिक्र करते हैं। वह लिखते हैं कि उनके दोस्त गुजर रहे हैं; उन्हें स्काइप पर अपनी क्लास लेनी पड़ रही है।
इस किताब से पता चलता है कि कैसे ब्लूम ने कविता के असर पर अपनी नई थ्योरी विकसित की, खुद को एक बुद्धिजीवी के तौर पर बदला और अपनी विरासत के मतलब को समझा। एक पाठक के तौर पर ब्लूम के काम करने के तरीके में प्यार हमेशा अहम था। दिलचस्प किस्सों और मार्मिक बातों से भरे ये पत्र, जिनमें से कई पहली बार प्रकाशित हुए हैं, बीसवीं सदी के साहित्य और ब्लूम के लंबे और शानदार कॅरिअर को एक नया नजरिया देते हैं।
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