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साग़र आज़मी: जब हाथ में क़लम था तो अल्फ़ाज़ ही न थे

saghar azmi famous ghazal aisi nahi hai baat ki qad apne ghat gaye
                
                                                         
                            
ऐसी नहीं है बात कि क़द अपने घट गए
चादर को अपनी देख के हम ख़ुद सिमट गए

जब हाथ में क़लम था तो अल्फ़ाज़ ही न थे
अब लफ़्ज़ मिल गए तो मिरे हाथ कट गए

संदल का मैं दरख़्त नहीं था तो किस लिए
जितने थे ग़म के नाग मुझी से लिपट गए

बैठे थे जब तो सारे परिंदे थे साथ साथ
उड़ते ही शाख़ से कई सम्तों में बट गए

अब हम को शफ़क़तों की घनी छाँव क्या मिले
जितने थे साया-दार शजर सारे कट गए

'साग़र' किसी को देख के हँसना पड़ा मुझे
दुनिया समझ रही है मिरे दिन पलट गए
2 सप्ताह पहले

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