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अज्ञेय: चाय पीते हुए मैं अपने पिता के बारे में सोच रहा हूँ

agyeya famous hindi kavita chai peete huye apne pite ka baare mein soch raha hoon
                
                                                         
                            

चाय पीते हुए
मैं अपने पिता के बारे में सोच रहा हूँ।

आपने कभी
चाय पीते हुए
पिता के बारे में सोचा है?

अच्छी बात नहीं है
पिताओं के बारे में सोचना।
अपनी कलई खुल जाती है।

हम कुछ दूसरे हो सकते थे।
पर सोच की कठिनाई यह है कि दिखा देता है
कि हम कुछ दूसरे हुए होते
तो पिता के अधिक निकट हुए होते
अधिक उन जैसे हुए होते।

कितनी दूर जाना होता है पिता से
पिता जैसा होने के लिए!

पिता भी
सवेरे चाय पीते थे
क्या वह भी
पिता के बारे में सोचते थे - 
निकट या दूर?
 

एक महीने पहले

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