आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

गुलज़ार: हर इतवार यही लगता है, देर से आँख खुली है मेरी

gulzar poetry har itvar yahi lagta hai der se aankh khuli hai meri
                
                                                         
                            

हर इतवार यही लगता है
देर से आँख खुली है मेरी,
या सूरज जल्दी निकला है
जागते ही मैं थोड़ी देर को हैराँ-सा रह जाता हूँ
बच्चों की आवाज़ें हैं न बस का शोर
गिरजे का घंटा क्यों इतनी देर से बजता जाता है
क्या आग लगी है?

चाय...?
चाय नहीं पूछी ‘आया’ ने?
उठते-उठते देखता हूँ जब,
आज अख़बार की रद्दी कुछ ज़्यादा है
और अख़बार के खोंचे में रक्खी ख़बरों से
गर्म धुआँ कुछ कम उठता है...
याद आता है...
अफ़्फ़ो! आज इतवार का दिन है। छुट्टी है!
ट्रेन में राज़ अख़बार के पढ़ने की कुछ ऐसी हुई है आदत
ठहरीं सतरें भी अख़बार की, हिल-हिल के पढ़नी पड़ती हैं! 
 

23 घंटे पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर