कभी जब याद आ जाते।
नयन को घेर लेते घन,
स्वयं में रह न पाता मन
लहर से मूक अधरों पर
व्यथा बनती मधुर सिहरन
न दुख मिलता न सुख मिलता
न जाने प्राण क्या पाते!
तुम्हारा प्यार बन सावन,
बरसता याद के रसकन
कि पाकर मोतियों का धन
उमड़ पड़ते नयन निर्धन
विरह की घाटियों में भी
मिलन के मेघ मड़राते।
झुका-सा प्राण का अंबर,
स्वयं ही सिंधु बन बन कर
हृदय की रिक्तता भरता
उठा शत कल्पना जलधर।
हृदय-सर रिक्त रह जाता
नयन-घट किंतु भर आते
कभी जब याद आ जाते।
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