आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

शैलजा पाठक: जब नहीं सोचती हूँ तुम्हें तब मैं कुछ नहीं सोचती

shailja pathak famous hindi kavita jab main nahin sochti hoon tumhein
                
                                                         
                            


जब नहीं सोचती हूँ तुम्हें
तब मैं कुछ नहीं सोचती
पैर के नखों से कुरेदती हूं
ज़मीं का पथरीलापन
तब तक जब तक
अंगूठे दर्द से बिलबिला ना उठे

जब मैं नहीं मिलती तुमसे
तब मैं किसी से नहीं मिलती
ज़रा से बादलों को खीचकर
ढक देती हूँ आईना
तुम धुंधले हो जाते हो

और जब मिलते हो तुम
मैं आसमानी ख़्वाबों में लिपटी
पूरी दुनिया को बदला हुआ देखती हूँ
कि जैसे पेड़ कुछ बड़े और हरे हो गए

पोखर का पानी साफ़ है
बिन मौसम ही खिले हैं खूब सारे कमल,
दहकते रंग के,
मेरी आँखों में खूब सारी
ज़िंदगी छलक रही है
मेरे हाथों में मेहदी का
रंग और महक

ऊपर आसमान में उड़ते
दो पतंग एक दूसरे से
गले मिलती हैं

जब मैं तुमसे मिलती हूँ
तब मैं मिलती हूं
अपने आप से... 
 

4 महीने पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर