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नागार्जुन: सहमतियों का गान नहीं, असहमतियों की साखी रचने वाला कवि 

नागार्जुन: सहमतियों का गान नहीं लिखता, असहमतियों की साखी रचने वाला कवि 
                
                                                         
                            नागार्जुन की विपुल रचनात्मकता की जिन विशेषताओं पर ध्यान जाता है वह है उनकी दृष्टि का निर्माल्य और असहमति का सौंदर्य। उनकी कविताओं और उपन्यासों के वस्तु वैविध्य पर गौर करें तो हम देखते हैं कि नागार्जुन की रचनाऍं समाज, राजनीति, संस्कृति और व्यवस्था पर एक क्रिटीक की तरह हैं। सच्चा कवि व्यवस्था का पोषक नहीं, आलोचक होता है। वह सहमतियों का गान नहीं लिखता, असहमतियों की साखी रचता है। कबीर के सदियों बाद ऐसी विस्फोटक चेतना की कविताऍं केवल नागार्जुन ने लिखी हैं।
                                                                 
                            

अरे इन दोउन राह न पाई---लिख कर कबीर ने हिंदू और मुसलमानों दोनों कौमों की दिशाहीनता और पारस्परिक कलह को वाणी दी और उनकी धर्मांधता पर प्रहार किया तो नागार्जुन ने सदैव आम आदमी के पक्ष में, आम आदमी की हैसियत से सत्ता-व्यवस्था, राजनीति, अहंकार, पद, ऐश्वर्य और पूंजी की मुखालफत की। कबीर ने भी आँखिन देखी की साखी लिखी थी, नागार्जुन भी अपनी ऑंखों एवं ऐंद्रिय बोध पर भरोसा करते थे। वे किसी भी हालत में पूँजीपतियों के पैरोकार नहीं हो सकते थे। 
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15 घंटे पहले

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