आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

अहमद फ़राज़ : विचारों से घोर प्रगतिशील और शायरी में ग़ज़ब के आशिक़

अहमद फ़राज़
                
                                                         
                            तरक्की पसंद शायरी के दौर में जिस एक शायर ने मूल लहजे को बजिद नहीं छोड़ा और तमाम उम्र ग़ज़ल की नाज़ुक मिज़ाजी से मुतासिर रहे अहमद फ़राज़ शायरी में उसी शख़्सियत का नाम है। फ़ैज़ के गम-ए- दौरां अपने गम-ए-जानां की एक अलहद और पुरकशिश दुनियां बनाकर फ़राज़ ने उर्दू शायरी को एक बहुत नर्म और नाज़ुक अहसास अता की और ग़ज़ल जिसका मतलब ही माशूका से गुफ़्तगू करना होता है उसे नए अंदाज़ दिए। मशहूर हो चुकी उनकी ग़ज़ल के इन शेरों से आप वाकिफ़ ही होंगे - 
                                                                 
                            

रंजिश ही सही दिल ही दुखाने के लिए आ 
आ फिर से मुझे छोड़ के जाने के लिए आ 

कुछ तो मिरे पिंदार-ए-मोहब्बत का भरम रख 
तू भी तो कभी मुझ को मनाने के लिए आ 

पहले से मरासिम न सही फिर भी कभी तो 
रस्म-ओ-रह-ए-दुनिया ही निभाने के लिए आ 

किस किस को बताएँगे जुदाई का सबब हम 
तू मुझ से ख़फ़ा है तो ज़माने के लिए आ 


बातचीत का यह अंदाज फ़राज़ साहब की निजी ख़ासियत थी। उनकी तमाम ग़ज़लों में उनका ये अंदाज अलग-अलग तरीके से सामने आता है और बिल्कुल नई कौम पैदा करता है - 

तेरे लहजे की थकन में तेरा दिल शामिल है
ऐसा लगता है जुदाई की घड़ी आ गई दोस्त

बारिशे संग का मौसम है मेरे शहर में तू
तू ये शीशे सा बदन ले के कहां आ गई दोस्त

मैं उसे अहद-शिकन कैसे समझ लूं जिसने 
आख़िरी खत में ये लिखा था, फकत आपकी दोस्त 


वैसे फ़राज़ साहब का ख़ानदानी ताल्लुक सूफी परंपरा से जुड़ता है और वह कोहाट के मशहूर संत हाजी बहादुर के वंशज है और उनका नाम भी है उसी तर्ज पर सैयद अहमद शाह लेकिन अपनी शायरी में ये किसी अबूझ ईश्वर की बात नहीं करते न ही किसी मजाज़ी इश्क के चक्कर में पड़ते हैं बल्कि उनका इश्क़ विशुद्ध हक़ीक़ी है और यदि इश्क़ में ख़ुदा कहते भी हैं तो किस अंदाज में कहते हैं - 

जख़्म को फूल तो सरसर को सबा कहते हैं
जाने क्या दौर है, क्या लोग हैं, क्या कहते हैं

जब तलक दूर है तो तेरी परस्तिश कर लें
हम जिसे छू न सके उसको ख़ुदा कहते हैं 


ख़ुदा का यह ज़िक्र फ़राज़ की ग़ज़लों में कई दफ़ा आता है और हर बार इसी अंदाज़ से आता है। यही अंदाज़ जो ग़ालिब के यहां भी अक्सरहां मिलता है - 

नाख़ुश है कभी बुत, कभी नाराज़ हरम है
हम दिलज़दगाँ का न खुदा है न सनम है

जो लिख नहीं सकता सफ़े-मिज़गॉं पे रकम है
गो हाथ को जुम्बिश नहीं आंखों में तो दम है 


फ़राज़ इश्क में बेलोसपन की हद तक जाते हैं उनकी शायरी में घुमा-फिराकर बात करने की जगह नहीं है। वह अपने तसब्बुर में अपनी प्रेमिका को बेपैरहन भी देखते हैं और उसे बहुत ख़ूबसूरती से कहते भी हैं - 

सुना है उसके बदन की तराश ऐसी है 
कि फूल अपनी कबाएं कतर के देखते हैं 

किसे नसीब कि बेपैरहन उसे देखे 
कभी-कभी दरो दीवार धर के देखते हैं 
आगे पढ़ें

आशिकी के ऐसे नाज़ुक मिज़ाज शायर को सत्ता बर्दाश्त नहीं कर पाई

एक वर्ष पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर