तरक्की पसंद शायरी के दौर में जिस एक शायर ने मूल लहजे को बजिद नहीं छोड़ा और तमाम उम्र ग़ज़ल की नाज़ुक मिज़ाजी से मुतासिर रहे अहमद फ़राज़ शायरी में उसी शख़्सियत का नाम है। फ़ैज़ के गम-ए- दौरां अपने गम-ए-जानां की एक अलहद और पुरकशिश दुनियां बनाकर फ़राज़ ने उर्दू शायरी को एक बहुत नर्म और नाज़ुक अहसास अता की और ग़ज़ल जिसका मतलब ही माशूका से गुफ़्तगू करना होता है उसे नए अंदाज़ दिए। मशहूर हो चुकी उनकी ग़ज़ल के इन शेरों से आप वाकिफ़ ही होंगे -
रंजिश ही सही दिल ही दुखाने के लिए आ
आ फिर से मुझे छोड़ के जाने के लिए आ
कुछ तो मिरे पिंदार-ए-मोहब्बत का भरम रख
तू भी तो कभी मुझ को मनाने के लिए आ
पहले से मरासिम न सही फिर भी कभी तो
रस्म-ओ-रह-ए-दुनिया ही निभाने के लिए आ
किस किस को बताएँगे जुदाई का सबब हम
तू मुझ से ख़फ़ा है तो ज़माने के लिए आ
बातचीत का यह अंदाज फ़राज़ साहब की निजी ख़ासियत थी। उनकी तमाम ग़ज़लों में उनका ये अंदाज अलग-अलग तरीके से सामने आता है और बिल्कुल नई कौम पैदा करता है -
तेरे लहजे की थकन में तेरा दिल शामिल है
ऐसा लगता है जुदाई की घड़ी आ गई दोस्त
बारिशे संग का मौसम है मेरे शहर में तू
तू ये शीशे सा बदन ले के कहां आ गई दोस्त
मैं उसे अहद-शिकन कैसे समझ लूं जिसने
आख़िरी खत में ये लिखा था, फकत आपकी दोस्त
वैसे फ़राज़ साहब का ख़ानदानी ताल्लुक सूफी परंपरा से जुड़ता है और वह कोहाट के मशहूर संत हाजी बहादुर के वंशज है और उनका नाम भी है उसी तर्ज पर सैयद अहमद शाह लेकिन अपनी शायरी में ये किसी अबूझ ईश्वर की बात नहीं करते न ही किसी मजाज़ी इश्क के चक्कर में पड़ते हैं बल्कि उनका इश्क़ विशुद्ध हक़ीक़ी है और यदि इश्क़ में ख़ुदा कहते भी हैं तो किस अंदाज में कहते हैं -
जख़्म को फूल तो सरसर को सबा कहते हैं
जाने क्या दौर है, क्या लोग हैं, क्या कहते हैं
जब तलक दूर है तो तेरी परस्तिश कर लें
हम जिसे छू न सके उसको ख़ुदा कहते हैं
ख़ुदा का यह ज़िक्र फ़राज़ की ग़ज़लों में कई दफ़ा आता है और हर बार इसी अंदाज़ से आता है। यही अंदाज़ जो ग़ालिब के यहां भी अक्सरहां मिलता है -
नाख़ुश है कभी बुत, कभी नाराज़ हरम है
हम दिलज़दगाँ का न खुदा है न सनम है
जो लिख नहीं सकता सफ़े-मिज़गॉं पे रकम है
गो हाथ को जुम्बिश नहीं आंखों में तो दम है
फ़राज़ इश्क में बेलोसपन की हद तक जाते हैं उनकी शायरी में घुमा-फिराकर बात करने की जगह नहीं है। वह अपने तसब्बुर में अपनी प्रेमिका को बेपैरहन भी देखते हैं और उसे बहुत ख़ूबसूरती से कहते भी हैं -
सुना है उसके बदन की तराश ऐसी है
कि फूल अपनी कबाएं कतर के देखते हैं
किसे नसीब कि बेपैरहन उसे देखे
कभी-कभी दरो दीवार धर के देखते हैं
वैसे तो उर्दू शायरी की परंपरा में ही वफ़ा-बेवफ़ा का कोई मूल्यगत मतलब नहीं है बल्कि बेवफ़ाई को ख़ास अंदाज़ में एक रूमानी दर्जा भी हासिल है। फ़राज़ के यहां भी बेवफाई की ये रुमानियत अपने पूरे शबाब में दिखती है -
बेनयाज़े-ग़मे- पैमाने-वफा हो जाना
तुम भी औरों की तरह मुझ से ज़ुदा हो जाना
हर एक से कौन मुहब्बत निबाह सकता है
सो हमने दोस्ती-यारी तो की वफ़ा नहीं की
हमेशा से वफा कारे-जियां है
मगर अपनी नज़र अंजाम पर नहीं
मैं क्या बताऊँ कि क्यों उसने बेवफाई की
मगर यही कि कुछ ऐसा मिज़ाज उसका था
फ़राज़ की शायरी पर फैज़ का गहरा असर दिखता है लेकिन बहुत ही मुख़्तलिफ़ अंदाज़ में। फैज ने जहां अपनी शायरी में ज़माने के दर्द को ज़्यादा तरजीह दी और उदार हृदय का परिचय देते हुए 'रकीब से' जैसी मशहूर नज़्म लिखी, जिसमें वह अपने रकीब से भी मुहब्बत का इज़हार करते हैं और उसे हमराह, हमनवां जैसा मानते हैं। फ़राज़ ने उसी तर्ज पर 'मुझसे पहले' जैसी नज़्म लिखी। इसमें शुरुआती रुझान तो फ़ैज़ की नज़्म की तरह दिखती है -
मुझसे पहले तुझे जिस शख़्स ने चाहा उसने
शायद अब भी तेरा ग़म दिल से लगा रखा हो
एक बेनाम सी उम्मीद पे अब भी शायद
अपने ख्वाबों के जज़ीरों को सजा रखा हो
लेकिन इस नज़्म का अंत वो बिल्कुल निजी चिंताओं से मुतासिर होकर करते हैं। यहां फ़राज़ को कोई दुविधा नहीं है। उनके लिए इश्क़ का मतलब सिर्फ़ इश्क़ है और कुछ नहीं, वह इश्क़ कमज़ोर भी है और ख़ुदपरस्त भी -
और मैं, जिसने तुझे अपना मसीहा समझा
एक ज़ख़्म और भी पहले की तरह सह जाऊँ
जिस पे पहले भी कई अहदे-वफा टूटे हैं
इसी दोराहे पे चुपचाप खड़ा रह जाऊँ
हैरत है इश्क़ और आशिकी के ऐसे नाज़ुक मिज़ाज शायर को ही सत्ता बर्दाश्त नहीं कर पाती। शायद सत्ता आशिक के ऐसे जुनून से डरती है कि जो किसी को डूबकर चाह सकता है, अपनी चाहत की हिफ़ाज़त के लिए वही बाग़ी भी हो सकता है। फ़राज़ साहब को भी पाकिस्तान के ज़िया उल हक़ की फ़ौजी तानाशाही ने उनके प्रगतिशील विचारों के कारण गिरफ़्तार किया और लगभग तीन सालों तक वे यूरोप के विभिन्न शहरों में निर्वासितों की तरह रहे, तभी शायद वो कहते हैं -
मुसाफिरत में भी तस्वरी घर को देखती है
कोई भी ख़्वाब हो तो ताबीर घर को देखती है
वतन से दूर भी आज़ादियां नसीब किसे
क़दम कहीं भी हो जंज़ीर घर को देखते हैं
फ़राज़ जब कोई नामा वतन से आता है
तो हर्फ़-हर्फ़ में तस्वीर घर को देखते हैं
फ़राज़ बहुरंगी शख़्सियत के मालिक थे। वो रेडियो के स्क्रिप्ट राइटर रहे, उर्दू के प्रोफ़ेसर रहे और बाद में पाकिस्तान साहित्य अकादमी के अध्यक्ष भी रहे। वो विचारों से घोर प्रगतिशील थे और शायरी में ग़ज़ब के आशिक -
कभी नदिया जैसे बोल कहे कभी सागर जैसा शोर करे
तेरा भेद भरा लहजा न खुले तेरी सारी कविताएं है अजब
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