जन्मा था जब—
न कोई नाम था, न परिभाषा,
केवल स्पंदन था,
और उस स्पंदन में समूची सृष्टि का मौन।
न ‘मैं’ था, न ‘मेरा’,
न चाह, न चयन,
केवल देखना था—
निर्मल, निर्विचार, निष्कलंक।
फिर किसी ने कहा— “यह जगत है”,
किसी ने सिखाया— “यह तुम हो”,
और शब्दों के सूक्ष्म बीज
मन की मिट्टी में पड़ते गए।
नाम मिले, रूप बने,
रूपों से अर्थ, अर्थों से आग्रह,
और आग्रह से जन्मा
एक अदृश्य बंधन।
अब वृक्ष, वृक्ष नहीं—
“मेरा” हो गया, “तेरा” हो गया,
अब हवा, हवा नहीं—
सुख-दुःख की माप बन गई।
शब्दों ने चित्र बनाए,
चित्रों ने सीमाएँ खींचीं,
और उन सीमाओं में
अनंत को बाँधने का भ्रम पलने लगा।
जो केवल था—
वह “होना चाहिए” बन गया,
जो स्वाभाविक था—
वह सुधार का विषय बन गया।
और यहीं से
शुरू हुई सूक्ष्म पीड़ा—
क्योंकि जो है, उसे न देख
हमने जो नहीं है, उसका स्वप्न रच लिया।
पर कभी-कभी—
जब शब्द थक जाते हैं,
और विचार अपने ही बोझ से चुप हो जाते हैं,
तब भीतर कहीं एक शून्य खुलता है।
वहीं—
जहाँ न भाषा पहुँचती है,
न परिभाषाएँ,
केवल साक्षी बचता है—
निष्पक्ष, निराकार, निर्विकार।
वहाँ वृक्ष फिर वृक्ष नहीं,
और न ही कोई नाम,
वहाँ सब कुछ है—
पर किसी “कहने” की आवश्यकता नहीं।
यही असब्द की दहलीज है—
जहाँ बंधन गिरते हैं,
और अस्तित्व स्वयं को
बिना किसी उपमा के जान लेता है।
शब्द बाहर रहें—
जीवन के व्यवहार में,
पर भीतर—
मौन की वह अग्नि जले
जो सब कुछ देखे,
पर कुछ भी पकड़े नहीं।
क्योंकि अंततः—
मुक्ति शब्दों को छोड़ने में नहीं,
उनसे परे हो जाने में है…
जहाँ सब कुछ है,
पर “कुछ भी” नहीं।
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