मैं मिट्टी से निकला सपना हूँ,
धूप ने जिसको गढ़ा है,
खपरैल की छाँव में पला हूँ,
संघर्ष ने जिसे पढ़ा है।
पिता की हथेलियों की रेखाएँ,
मेरी तकदीर बन गईं,
खेतों की सूखी दरारें
मेरी तदबीर बन गईं।
माँ ने चूल्हे की आँच में
उम्मीदों को सहेजा था,
रोटी की खुशबू में उसने
मेरा कल ही बुन डाला था।
दादी की झुर्रियों में जैसे
समय ठहर-सा जाता था,
जब भी स्कूल को निकलता,
आशीष रास्ता बन जाता था।
गाँव की वो टूटी पगडंडी
आज भी याद आती है,
खपरैल का छोटा-सा घर
दिल में दीप जलाती है।
आज किताबों के बीच बैठा
मैं सपनों को गढ़ता हूँ,
कॉलेज की राहों पर चलकर
अपना भविष्य पढ़ता हूँ।
शहर की भीड़ में अक्सर
गाँव मुझे बुलाता है,
पिता का पसीना अब भी
मुझको आगे बढ़ाता है।
मैं जानता हूँ —
मेरे पीछे तीन उजाले हैं,
पिता की मेहनत,
माँ की ममता,
दादी के आशीष निराले हैं।
मैं गिरूँगा तो संभल जाऊँगा,
यह विश्वास पुराना है,
खपरैल के घर से निकला हूँ,
मुझे आसमान तक जाना है…
-अजीत पड़वार
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