पंजाबी-हिंदी साहित्य की शीर्ष लेखिका अमृता प्रीतम, इमरोज़ के साथ मिलकर नागमणि नाम की पत्रिका संपादित किया करती थीं। उससे जुड़े तमाम क़िस्से जो मशहूर हैं, उनमें से एक है। इस क़िस्से को इमरोज़ ने किताब 'किसी तारीख़ को' में दर्ज किया है।
जब नागमणि का कॉलम शुरु हुआ - 'वह घड़ी: वह घटना', तो उसके लिए प्रेम गोरखी ने एक घटना लिखकर भेजी कि -1967 में उसे किसी ने मुश्कें कसवाकर पुलिस की हिरासत में डलवा दिया, जहां उस पर गालियां और मार पड़ती रही। उसका दोष सिर्फ़ यह था कि उसने जिस लड़की से प्यार किया उसके पिता को वह पसन्द नहीं था। साइकिल की चोरी का झूठा इल्ज़ाम लगाया गया। गोरखी के पिता ने उसे पुलिस की मार से बचाने के लिए पांच सौ की रिश्वत भी दी। फिर मार तो कम हो गई, लेकिन तीन साल मुक़दमा चलता रहा। उन तीन वर्षों में उसके भीतर बदले की भावना पैदा हो गई। वह गुंडे लोगों के घर जाकर तलवार चलाना सीखने लगा। किताबें उसने भुला दीं। और उसके अन्दर का मनुष्य बदलने लगा। पर उसके भीतर एक लेखक भी था। उसने एक कहानी लिखी और अमृता के पास 'नागमणि' के लिए भेज दी। उसके ही शब्दों में, "उम्मीद तो नहीं थी, पर काम बड़ा उलटा हो गया। अमृता का बड़े मोह से लिखा एक लम्बा ख़त मेरे नाम आया। ख़त को मैंने कसकर छाती से लगाया, चूमा और दहलीज़ के पास खड़े हुए मेरी आंखें भर आईं। लिखा था 'हैलो, प्रेम! तुम्हारी कहानी बहुत प्यारी है। तुम्हारे अन्दर एक कलाकार है, तुम उसे मरने मत देना... तुम बहुत सुन्दर कहानियां लिखोगे... कभी निराश मत होना... बहुत सारा प्यार...' और भी बहुत कुछ था, पर मेरे लिए यही कुछ 'सातों समन्दर' थे। दो-तीन कहानियां 'नागमणि' में छप गईं, तो मेरे भीतर एक और मनुष्य उग आया था।
और मुझे क्या सूझी, मैंने एक छोटा-सा ख़त उस हाकिम के नाम लिखा - 'जज साहिब! मैं आपसे फैसला सुनने के लिए आपकी अदालत में मुलज़िम की हैसियत से 15 अक्तूबर को पेश होऊंगा। मैं नहीं चाहता मुझे सज़ा हो। मेहरबान जनाब! मुझे कहानियां लिखने और पढ़ने का शौक़ है। मैं ज़िन्दगी में अच्छा लेखक बनना चाहता हूं। आप मेरे ख़त के साथ नत्थी किए हुए प्रसिद्ध लेखिका अमृता प्रीतम के ख़त से मेरे बारे में कुछ जान सकेंगे ।... मैं फिर विनती करना चाहता हूं कि आप मेरे ऊपर रहम करें। आपका दो शब्दों का फैसला मेरी ज़िन्दगी को बर्बाद भी कर सकता है, और संवार भी सकता है। और मैंने अपने ख़त के साथ अमृता प्रीतम का पहला ख़त नत्थी करके डाक में डाल दिया। जज का नाम जी. के. गोयल था, वह (फ़ैसलेवाले दिन) चश्मे में से एकटक मेरी तरफ देख रहा था। उसने कहा- 'मेरे पास आओ।' मैं कठघरे के ऊपर की तरफ घूमकर जज के पास जाकर खड़ा हो गया। उसने मेरे हाथों को पकड़कर कस लिया और कहा - 'मैं तुम्हें बड़ा लेखक बना हुआ देखना चाहता हूं। खूब लिखो'... और उसने क्लर्कों की तरफ़ मुंह करके कहा - 'प्रेमदास वल्द अर्जुनदेव बरी'।"
आगे पढ़ें
कमेंट
कमेंट X