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अंतर्मुखी

                
                                                         
                            सिर्फ सांसे भी बहुत हैं जिए जाने के लिए
                                                                 
                            
हम भटकते रहे न जाने क्या पाने के लिए
खुशी तो खुद में थी ढूंढा किए कहां न कहां
हैं मुझे होंठ बहुत मेरे मुस्कुराने के लिए
अब मुझे औरों की दरकार नहीं होती है
है बहुत आईना कुछ सुनने सुनाने के लिए
तलब तन्हाइयों की मुझको हुई जाती है
दिल ए नादान है हर साथ निभाने के लिए
उसे क्या चाहिए अब, खुद को जिसने पाया
है नहीं राज ये सभी को बताने के लिए
मेरी फितरत में इत्तेफाक नहीं है कोई
हैं सभी कारवां, केवल गुजर जाने के लिए
चांद की छोड़ो, किसी तारे की नहीं चाहत की
कोई झोंका हवा का भी है जगाने के लिए
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एक घंटा पहले

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