अगर कला कलाकार को कुछ सिखाती है, तो यह मानव स्थितियों की निजता है। निजी उद्यम के सबसे प्राचीन और सबसे शाब्दिक रूप में होने के नाते यह जानबूझकर या अनजाने में किसी व्यक्ति में विशिष्टता, वैयक्तिकता और अलगाव की भावना भरती है-जो उसे एक सामाजिक प्राणी से स्वायत्त 'मैं' में बदल देता है। बहुत-सी चीजें ऐसी हैं, जो साझा की जा सकती हैं, जैसे-बिस्तर, रोटी, आदि, लेकिन कविता साझा नहीं की जा सकती। कला का काम, खासकर साहित्य और उसमें भी कविता मनुष्य को एकांतिक रूप से संबोधित करती है। भाषा और साहित्य ऐसी चीजें हैं, जो किसी भी सामाजिक संगठन की तुलना में ज्यादा प्राचीन, अनिवार्य और टिकाऊ हैं। अक्सर राज्य की अव्यवस्था, विडंबना और उदासीनता साहित्य के द्वारा व्यक्त की जाती है।
कम से कम कहने के लिए, जब तक राज्य स्वयं को साहित्य के मामले में हस्तक्षेप की अनुमति देता है, साहित्य को भी राज्य के मामले में हस्तक्षेप का अधिकार है। कोई भी राजनीतिक व्यवस्था, जो भूतकाल का एक रूप है, स्वयं को वर्तमान या अक्सर भविष्य काल के रूप में निरूपित करने की इच्छा रखती है। राज्य का दर्शन हमेशा 'कल' रहा है, लेकिन भाषा और साहित्य का सरोकार हमेशा 'आज' से रहा है। साहित्य की एक बड़ी विशेषता है कि यह लोगों को अपना जीवन विशिष्ट बनाने में मदद करता है। यह लोगों को अपने पूर्ववर्तियों की भीड़ से अलग रहने में सहयोग करता है। आखिर कौन-सी चीज कला और साहित्य को उल्लेखनीय बनाती है? वह यह कि वे पुनरावृत्ति से घृणा करते हैं। रोजमर्रा के जीवन में आप एक ही चुटकुला तीन बार सुना सकते हैं और तीन बार हंस सकते हैं। पर कला में इस तरह के आचरण को क्लीशे (पुनरावृत्ति) कहा जाता है।
-जोसेफ ब्रॉडस्की, नोबेलजयी अमेरिकी कवि व निबंधकार
एक वर्ष पहले
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