सखी अस्तित्व शून्य था तुम्हारा , मशीन पीढ़ी बढ़ाने की
इसे नाम समझो या काम
सखी ,समाज ने चरित्र शून्य समझ लिया था तुम्हारा
व्यवस्थाऐं थी बंटी वर्णों में कुछ
महिलाएं थी छंटी उस समाज में कुछ
जिन्हें न बोलने का था अधिकार
सखी ,न निकलना घर से बाहर
चुप रहाना इस समाज में
सखी मूर्ति के सामान
फिर
उठकर उस भीड़ से वो अम्बर आया
जिसने देखा न वो स्कूल
उस सखी को bhi
उसने आंखों में आंखे डाल कर बात करने का अधिकार दिलाया
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बोली सखी मेरी
बदलाव जरा सा ही तो आए
सुनाकर सती प्रथा उसको
सखी के आसूं फिर रुक न पाए
सती प्रथा को
सुनकर ही रोना आए
सुनकर सखी सती को
संविधान को ही अपना पवित्र ग्रन्थ बताए
ओर भी थी घटनाएं कुछ , रु ब रु सखी उनसे
तुम भी सखी के जैसे खुद के , अधिकारों को
समझे ओर आवाज उठाए
ये पंक्ति उन लोगों के लिए जो
अलग ही विचार धारा मानते है
ओर जो कहते हो तुम लोग
आखिर कौन है वो हमारा
तो कुछ शब्दों में
मंदिर में रखे उस पत्थर से बढ़कर
भगवान है वो हमारा
वो संविधान है हमारा ।।
बाबा साहेब है हमारा
जय भीम जय सविधान
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