आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

अँधेरी रात में जुगनू को...

                
                                                         
                            अँधेरी रात में जुगनू को रहनुमा लिख दे।
                                                                 
                            
तू मेरे दर्द की तक़दीर में दवा लिख दे।

भले ही रंज-ओ-मुसीबत का सिलसिला लिख दे,
मगर तू साथ में लड़ने का हौसला लिख दे।

अगर यही है मुक़द्दर में मेरी ऐ मौला,
तो हर क़दम पे मुझे सब्र का दिया लिख दे।

मिले जो ज़ख़्म ज़माने से, मुस्कुरा के सहूँ,
तू मेरी ज़ीस्त का हासिल फ़क़त रज़ा लिख दे।

दिलों में उठ गई जो नफ़रतों की दीवारें,
उन्हें गिरा के मोहब्बत का रास्ता लिख दे।

ग़मों की धूप में झुलसे हुए मुसाफ़िर हैं,
तू अपनी रहमतों की ठंडी-सी हवा लिख दे।

जो लिख रहा है तू तक़दीर मेरी ऐ मौला,
तो मेरी माँ की दुआओं को आसरा लिख दे।

- अज़हर साबरी
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
10 घंटे पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर