आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

बादलों को जुकाम

                
                                                         
                            बारिश—
                                                                 
                            
बादलों को ज़ुकाम हो गया है।
वे ज़ोर-ज़ोर से छींक रहे हैं,
आसमान में गूंजती उनकी आवाज़;
नाक बहना अब शुरू हो चुका है।

ओ मैले कपड़ों में लिपटे
दरिद्र से बादलों,
मैं तुम्हें अपनी शोक-संवेदना देता हूँ।

क्योंकि मैं भी—
इस शरीर नाम के वस्त्र में लिपटा,
एक थकी हुई आत्मा पर पहना हुआ—
अब दरिद्र हो चला हूँ,
बारिश से नहीं,
बल्कि उसी जिद्दी ज़ुकाम से। 
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
एक घंटा पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर