बारिश—
बादलों को ज़ुकाम हो गया है।
वे ज़ोर-ज़ोर से छींक रहे हैं,
आसमान में गूंजती उनकी आवाज़;
नाक बहना अब शुरू हो चुका है।
ओ मैले कपड़ों में लिपटे
दरिद्र से बादलों,
मैं तुम्हें अपनी शोक-संवेदना देता हूँ।
क्योंकि मैं भी—
इस शरीर नाम के वस्त्र में लिपटा,
एक थकी हुई आत्मा पर पहना हुआ—
अब दरिद्र हो चला हूँ,
बारिश से नहीं,
बल्कि उसी जिद्दी ज़ुकाम से।
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