"दुनिया भर में
नाज़ुक दिमागों की कमी नहीं—
यह कोई चमत्कार नहीं,
बस एक सामान्य मानवीय विडंबना है।
और हमारे यहाँ,
वे मानो विशेष उत्सव बन जाते हैं—
जितने अधिक, उतना ही “पावन” घोषित।
बताइए ज़रा,
अपने ही सिर को तोड़कर
कौन-सी उन्नति उगती है?
क्या बुद्धि भी साथ बह जाती है,
या केवल ज़मीन पर
अर्थहीनता का लाल रंग फैलता है?
आप भक्ति कहते हैं—
पर वह तो उन्माद की ढोलक है,
जिस पर हिंसा
ताल साधती है।
ना कोई बुराई उखड़ती,
ना कोई अँधेरा घटता—
बस स्वयं का विनाश
एक सार्वजनिक प्रदर्शन बन जाता है।
वाह, क्या तपस्या है!
संयम को त्यागकर
घावों की प्रदर्शनी लगाना—
इसे ही क्या अब आध्यात्म कहते हैं?
यह कैसी अर्पणा है?
एक कटा हुआ प्रतीक,
जो विवेक के चरणों में
लुढ़कता फिरता है।
कृपया—हाँ, कृपया—
इन उग्र आवेगों को
महिमा का मुकुट मत पहनाइए।
इन्हें नाम दीजिए—
कमज़ोरियों के तूफ़ान,
ना कि कोई दिव्य वर्षा।
भक्ति को साँस लेने दीजिए,
खून बहाने नहीं।
शक्ति को थामना सीखिए,
फट पड़ना नहीं।
और अंत में—
सारे सम्मान के साथ—
इस आत्म-विनाश के नाटक पर
तालियाँ बजाना बंद कीजिए।
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