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जब खामोशी बोलना सीखती है

                
                                                         
                            ख़ामोश ख़यालों की गलियों में,
                                                                 
                            
अल्फ़ाज़ यूँ ठहरते हैं
जैसे बारिश की बूंदें—
गिरें या बादल ही बनी रहें।

एक दिल, जो कभी मौसमों सा गूंजता था,
अब अपनी ही सदा सुनता है,
हर ठहराव में ढूँढता है
एक अनकही दास्तान।

कुछ दिन थे—
जब उम्मीद नंगे पाँव चलती थी,
अनदेखे काँटों से लहूलुहान,
फिर भी मुस्कुराती हुई
जैसे दर्द से अनजान।

और कुछ रातें—
जो अँधेरे को सांसों में बुनती रहीं,
तन्हाई को सिखाती रहीं
बिना आवाज़ गुनगुनाना।

मैंने मायने तलाशे
टूटे हुए लम्हों के टुकड़ों में,
वक़्त की उस कंपकंपी में
जहाँ बिछड़ना और लौटना
एक साथ ठहर जाते हैं।

पर कहीं—
खोने और सीखने के दरमियान,
ख़ामोशी और चीख़ के बीच—
एक नाज़ुक सच्चाई मिली:

जब दुनिया मुँह मोड़ ले,
जब साये आसमान निगल जाएँ,
रूह फिर भी फुसफुसाती है—
धीरे, ज़िद्दी, ज़िंदा—

“मैं अब भी यहाँ हूँ।”
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एक घंटा पहले

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