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मैं चांद बन जाऊं तुम चांदनी लाना ll

                
                                                         
                            मैं नीर बन जाऊं तुम प्यास बन जाना
                                                                 
                            
मैं चांद बन जाऊं तुम चांदनी लाना
मैं गीत होंठों का तुम शायर बन जाना

अक्षर –अक्षर जोड़ कर शब्द बनाया है
तेरे लिए हमने कविता का घर बनाया है
उस घर का मैं दीपक हूं तुम रौनक बन जाना
मैं नीर बन जाऊं तुम प्यास बन जाना
मैं चांद बन जाऊं तुम चांदनी लाना

आश्मा से पूछना ये चांद सितारे क्यों
दरिया से पूछना बरखा मिलने को तड़पे क्यों
जो किनारा मिल सका न नदियों से पूछे क्यों
मैं शांत समंदर सा तुम लहरें बन जाना
मैं नीर बन जाऊं तुम प्यास बन जाना
मैं चांद बन जाऊं तुम चांदनी लाना

मेरे नैना तकते रहते है राह तुम्हारी क्यों
जिस राह में तुमने छोड़ दिया उस राह में नैना रोते क्यों
तुमने हृदय की पीड़ा न समझी उस आग में पतंगें सा जल जाना
मैं नीर बन जाऊं तुम प्यास बन जाना
मैं चांद बन जाऊं तुम चांदनी लाना ll

मन भर आया इस दुनिया से पल पल मुझको ठुकराते गए
प्रीत मांग मांग कर मिल न सका पल पल मुझको सताते गए
मैं रोया वो हंसती रही खुद भोले देख देख कर हंसते रहे
पूछ लिया मैने भोले से प्रेम का वर मुझे दे जाना
मैं नीर बन जाऊं तुम प्यास बन जाना
मैं चांद बन जाऊं तुम चांदनी लाना ll
-दीपक मिश्र 
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
2 घंटे पहले

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