आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

अगर मैं चरवाहा होता

                
                                                         
                            मैं अभागा रहा जो मैं
                                                                 
                            
चरवाहा ना बन पाया
चरवाहा होता तो
नित्य कानन में
बांसूरी में सप्तक छेड़ता
भौर में प्रदीप्त तारों का
पुंज देखता
किसी वाटिका की डाल से
मवेशियों को हांक लगाता
गोधुलि बेला में
गायों के खूरो से जो धुल
पसरती
उसे अपने मस्तक पर लगाता
मैं अभागा रहा जो मैं
चरवाहा ना बन पाया
-बिजय जोशी
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
एक घंटा पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर