मैं अभागा रहा जो मैं
चरवाहा ना बन पाया
चरवाहा होता तो
नित्य कानन में
बांसूरी में सप्तक छेड़ता
भौर में प्रदीप्त तारों का
पुंज देखता
किसी वाटिका की डाल से
मवेशियों को हांक लगाता
गोधुलि बेला में
गायों के खूरो से जो धुल
पसरती
उसे अपने मस्तक पर लगाता
मैं अभागा रहा जो मैं
चरवाहा ना बन पाया
-बिजय जोशी
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