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घर की बातें

                
                                                         
                            जब तक घर की बातें
                                                                 
                            
घर वाले करते हैं,
तब तक घर, घर कहलाते हैं।

जैसे ही घर की बातें
बाहर निकल जाती हैं,
घर की बातें बाहर वाले करते हैं।

तब वह घर
घर नहीं रहते।
इन घरों में घर वाले तो रहते हैं
पर बाहर वाले चलाते हैं।
तब घर, घर नहीं-
रणक्षेत्र बन जाते हैं।

बेघर हो जाते हैं वे घर,
जिन घरों से विभीषण निकल जाते हैं।
जिन घरों में शकुनी आ जाते हैं,
वे घर, घर नहीं-
लंका या कुरुक्षेत्र बन जाते हैं।
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37 मिनट पहले

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