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नाज़िश प्रतापगढ़ी: फूट चुकी हैं सुब्ह की किरनें सूरज चढ़ता जाएगा

nazish pratapgarhi famous ghazal phoot chuki hain subah ki kirnein sooraj chadhta jayega
                
                                                         
                            


फूट चुकी हैं सुब्ह की किरनें सूरज चढ़ता जाएगा
रात तो ख़ुद मरती है सितारो तुम को कौन बचाएगा

जो ज़र्रा जनता में रहेगा वो तारा बन जाएगा
जो सूरज उन को भूलेगा वो आख़िर बुझ जाएगा

तन्हा तन्हा रो लेने से कुछ न बनेगा कुछ न बना
मिल-जुल कर आवाज़ उठाओ पर्बत भी हिल जाएगा

माना आज कड़ा पहरा है हम बिफरे इंसानों पर
लेकिन सोचो तिनका कब तक तूफ़ाँ को ठहराएगा

क्यूँ चिंता ज़ंजीरों की हथकड़ियों से डरना कैसा
तुम अंगारा बन जाओ लोहा ख़ुद ही गल जाएगा

जनता की आवाज़ दबा दे ये है किस के बस की बात
हर वो शीशा टूटेगा जो पत्थर से टकराएगा

पूँजी-पतियों याद रखो वो दिन भी अब कुछ दूर नहीं
बंद तिजोरी में हर सिक्का अंगारा बन जाएगा

दुख में रोना-धोना कैसा मूरख इंसाँ होश में आ
तू इस भट्टी में तप-तप कर कुंदन बनता जाएगा

तन के नासूरों को उजले कपड़ों से ढाँपा लेकिन
किस पर्दे में ले जा कर तू मन का कोढ़ छुपाएगा

किस ने समझा है ढलते सूरज का ये संदेश यहाँ
जो भी बोल बड़ा बोलेगा इक दिन मुँह की खाएगा

3 सप्ताह पहले

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