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तुम्हारे पैर

                
                                                         
                            तुम्हारे पैरों को स्पर्श करता हूँ,
                                                                 
                            
नमन करता हूँ।
मैं तुम्हारे पैरों से प्रेम करता हूँ,
महज़ इसलिए कि मेरा वज़न
तुम्हारे पैरों ने सहा-
उस समय,
जब हमारे अपने पैर इस क़ाबिल नहीं थे
कि वे अपना ही वज़न सह सकें।

तुम्हारे पैर मुझे ले गये-
शौचालय, विद्यालय,पूजालय,
खेत और खलिहान तक,
जहाँ से पाया मैंने इतना ज्ञान।

यदि तुम्हारे पैरों ने सहारा न दिया होता,
यदि तुम्हारे पैरों का साथ न मिला होता,
तो आज यह व्यक्ति
बेचारा और बेसहारा होता।

आज मुझे गर्व है-
अपने पैरों पर नहीं,
तुम्हारे पैरों पर,
जिन्होंने मेरे पैरों में
उड़ान के पर लगा दिये।

कहाँ हैं तुम्हारे वे पैर?
उन्हें शत-शत नमन,
उन्हें शत-शत प्रणाम।
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एक घंटा पहले

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