बिसात पर जब पहली बार रखा गया,
तब ही जान लिया था—
चालें मेरी नहीं, चालक की हैं,
और चालक की उँगलियाँ नियति चुनती हैं,
न कि कोई तार्किक करुणा।
सीधा आगे बढ़ना, टेढ़ा मारना,
यह मेरा जन्म-सिद्ध अभिशाप है।
हर कदम पर घोड़े की दहाड़,
हाथी का अहंकार,
रानी का अभिमान—
सबने मुझे कुचलना चाहा,
पर मैं रुकी नहीं।
मुझे रुकना आता ही नहीं,
क्योंकि रुकना मोहरों की मृत्यु है।
आखिरी घर पहुँची, तो खिलाड़ी ने पाँच खोल खोले,
पाँच रूपों का वरदान दिया—
रानी बनी, तो दिशाएँ बदली;
हाथी बनी, तो दीवारें टूटीं;
घोड़ा बनी, तो कोणों का काल बनी;
ऊँट बनी, तो छल-छद्म सिखाया;
वज़ीर बनी, तो सलाहों का सागर बनी।
पर इन पाँचों के पीछे,
एक खाली जगह थी—
जहाँ राजा को बैठना चाहिए था।
खिलाड़ी रुका,
थोड़ा हँसा,
फिर बोला—
"यह गद्दी तेरी औकात से परे है,
क्योंकि राजा तो मेरे हाथ का खिलौना है;
वह काँच सा है,
और तू आग है।
आग काँच पर बैठे, तो गल जाए।"
जीत का श्रेय लेते हुए,
जब मेरी जरूरत खत्म हुई,
तो हाथ ने ही धूल चटाई।
शब्द थूके गए—"बेकार", "नालायक", "यह तो पागल है।"
पागल?
हाँ, मैं पागल हूँ,
क्योंकि जो होश में रहता है,
वह कभी नहीं पूछता—
"मैं स्वयं क्यों नहीं बन सकती?"
उन्होंने मुझे फेंक दिया,
यह सोचकर कि मैं टूट गई।
पर टूटती तो वह है,
जिसके पास खोने को कुछ हो।
मेरे पास तो बस मैं थी,
और मैंने स्वयं को खोया नहीं,
बल्कि खोज लिया।
राजा—वह छठा मोहरा,
जो कभी मुझे न मिला—
वास्तव में एक कैदी है।
चार दिशाओं में उसके चार रखवाले,
और एक खिलाड़ी जो उसकी साँसों पर नियंत्रण रखता है।
वह एक कदम बढ़े,
तो पूरी बिसात चीख उठती है—"चेक!"
मुझसे पूछो, क्या यही राजगद्दी है?
क्या यही वह बड़प्पन है,
जिसके लिए प्यादे अपनी जान दे देते हैं?
नहीं।
मुझे राजगद्दी न देकर,
उसने मुझे स्वतंत्रता दे दी।
खिलाड़ी को लगता है,
वह मुझे चला रहा है,
पर यह भ्रम उसका सबसे बड़ा अहंकार है।
हाँ, उँगलियाँ उसकी हैं,
हाँ, बिसात उसकी है,
पर मेरी हर चाल के पीछे
एक विद्रोह छिपा है,
जो उसकी गणना को धता बताता है।
वह मुझे रानी का मुखौटा पहनाए,
या हाथी का खोल,
पर मेरी धड़कन एक ही है—
एक ऐसी चाल चलने की,
जिसके बाद न वह खेल बचे,
न बिसात,
न खिलाड़ी।
आज जब मैं उस अंधेरे कोने में पड़ी हूँ,
जहाँ फेंकी गई हर चीज़ मिट्टी हो जाती है,
तब मुझे समझ आया—
मैं वह प्यादा नहीं,
जो राजा बनने के लिए तरसे;
मैं वह बीज हूँ,
जो राजा के सिंहासन के नीचे बोया गया था।
अब मुझसे पूछो—
क्या राजा के बिना शतरंज अधूरी है?
या फिर,
राजा तो बस एक नाम है,
और खेल तो मेरी चालों का नाम है?
मेरी एक चाल सारे नियम बदल सकती है—
क्योंकि नियम हाथों के लिए हैं,
पर विद्रोह प्यादे के जन्मसिद्ध अधिकार हैं।
सुन, खिलाड़ी,
तूने मुझे 'पागल' कहा,
'बेकार' कहा,
और फिर भी मैंने चालें चलीं।
अब तू जितना चाहे,
नई बिसात बिछा ले,
नए मोहरे ला ले,
पर तुझे हर खेल में एक चाल ऐसी मिलेगी,
जो तेरी नहीं,
मेरी होगी।
छठा मोहरा न मिला,
तो क्या?
मैंने स्वयं को छठा पहिया बना लिया—
वह पहिया,
जो बिसात के हरे-पीले खानों से ऊपर उठकर,
अपनी लीक स्वयं खींचता है।
यही मेरी राजगद्दी है,
यही मेरा चेकमेट।
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