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मर्जी के मालिक थे अपनी जिन्दगी के हम

                
                                                         
                            गाँव कभी भी छोड़ने का विचार नही था
                                                                 
                            
पर इसके सिवा कोई उपचार नही था.!

सब कुछ था वहां पर, घर, खेत-खलिहान,
बस खाली वहां कुछ रोजगार नहीं था.!

मिल-ज़ुल के रहते सभी ना कोई छल-कपट,
शहर जैसे लोग यहाँ कोई होशियार नही था.!

जितने में थे लोग सभी मन से खुशहाल थे
दिखावापन का वहां कोई बाजार नहीं था.!

मर्जी के मालिक थे अपनी जिन्दगी के हम
सुकून के लिए बस अकेला ऐतवार नहीं था.!

'राहुल" ना चाह के भी पकड़ लिया था ट्रेन कभी,
मन उस वक्त भी घर से निकलने को तैयार नही था
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एक घंटा पहले

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