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बादलों से पूछती हूँ

                
                                                         
                            “बादलों से पूछती हूँ”
                                                                 
                            

हँसती हूँ मैं दुनिया के सामने,
भीतर है एक खामोश गली,
छत पर खड़ी निहारूँ बादल,
मन की बात कहूँ किससे भली?

कामों में दिन तो कट ही जाता,
शाम आते ही छा जाए सन्नाटा,
दौलत नहीं, दिखावा नहीं चाहिए,
बस एक साथी, जो समझे मेरे मन का खाता।

चाय की चुस्की में बाँटे छोटी-छोटी हँसी,
बाजार जाए साथ, यूँ ही बिन कहे,
मन ऊब जाए तो निकले बाहर कहीं,
लंच की मेज पर बातें हों रंग बहे।

साल में एक बार निकले लम्बी ड्राइव पर,
खुले रास्तों पर छूट जाए तनाव,
मैं भी जीना चाहूँ एक आम-सी जिंदगी,
माँ बनकर बुनूँ सपनों का एक नया गाँव।

शायद किसी दिन पूरी हो ये हसरत मेरी,
कोई आए जो पढ़ ले दिल की इबारत,
तब ये अकेलापन बदल जाए उजाले में,
और महक जाए मेरे आँगन की हर दीवारत।
- जगदीश प्रसाद शर्मा
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
एक घंटा पहले

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