"झलकारी बाई: बलिदान की अमर गाथा"
बुंदेलखंड की धरती पर 22 नवंबर को आई थी,
गरीब घर की बेटी, पर आँखों में आज़ादी लाई थी।
नाम था झलकारी, पर काम था सबसे न्यारा री,
झाँसी की 'दुर्गा दल' की बनीं थी सेनापति प्यारी।
तोप चलाना, घुड़सवारी सब हुनर कमाल था,
रानी सा रूप और साहस बेमिसाल था।
जब ह्यूरोज ने आकर झाँसी को था घेरा,
देशभक्ति का ज्वार उनके मन में आया फेरा।
किले पर संकट आया, रानी पर आफत आई,
तब झलकारी ने रानी का वेश खुद पर सजाई।
"मैं ही लक्ष्मीबाई हूँ" कह दुश्मन को भरमाया,
और असली रानी को सुरक्षित बाहर पहुँचाया।
खुद मोर्चे पर डटीं, गोलियों की बौछार सही,
पीठ ना दिखाई कभी, सीना तानकर लड़ी।
4 अप्रैल 1857 को प्राण देश पर वार दिए,
बलिदान देकर अमरता का ताज स्वयं धार लिए।
नारी शक्ति की मिसाल बन जग में नाम किया,
2001 में भारत ने डाक टिकट से सम्मान दिया।
झलकारी कह गईं, "देश पहले, प्राण बाद में",
ऐसा त्याग ही लिखा जाता है आज़ादी के नाम में।
कोटि-कोटि नमन उस शेरनी को बारम्बार,
जिसने शीश देकर रचा इतिहास बेमिसाल।
- जगदीश प्रसाद शर्मा
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