"कांवड़ और नीलकंठ"
समुद्र मंथन में जब निकला हलाहल विष,
सारा जग डरा, कांपा सकल जगदीश।
भोले ने जग की खातिर विष कंठ में धारा,
तभी से वो कहलाए 'नीलकंठ' हमारा।
विष की तपिश मिटाने को, शीतलता देने को,
भक्त गंगाजल ले आएं, जलाभिषेक करने को।
कांवड़ उठे कंधों पर, बम-बम के जयकार,
पग-पग में भक्ति बहे, मन में प्रेम की धार।
पहले कांवड़िया परशुराम भक्त कहाए,
गढ़मुक्तेश्वर से जल लाकर पुरा में चढ़ाए।
लंकापति रावण भी आया उसी धाम,
जल चढ़ाकर बोला "हर-हर" एक ही नाम।
कांवड़ सिर्फ जल नहीं, ये त्याग की मिसाल है,
चलते-चलते सीख देती, सेवा ही असल है।
प्यास बुझाते पथिक की, बोझ बाँटते साथी का,
भेद मिटे, सब एक हों — यही शिव का पाठ है।
महादेव को जल चढ़े तो मन भी शीतल हो,
क्रोध, ईर्ष्या, द्वेष सब विष जैसे गल जाएं।
जैसे शिव ने विष पिया, जग को अमृत दिया,
वैसे हम भी दुख हरें, सबको सुख की राह दिया।
बम बम भोले! सब प्रेमीजनों पर कृपा बरसे,
कांवड़ की हर बूंद से धरती और मन तरसे।
नीलकंठ की दया से जीवन निर्मल हो जाए,
शिव कृपा से सबका कल्याण हो जाए।
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