आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

श्रवण का संस्कार

                
                                                         
                            "श्रवण का संस्कार"
                                                                 
                            

श्रवण केवल कान का काम नहीं, ये तो मन का संस्कार है।
उत्तर देने को जो सुने, वो शब्दों का व्यापार है।

समझने को जो सुने, वो दिल का उपहार है।
साहित्य भी यही कहता है, संवेदना ही सार है।

लेखक लिखता कम है, समाज की नब्ज़ को सुनता है।
मौन की भाषा पढ़ता है, अनकहे को शब्द देता है।

यदि धैर्य से सुनना सीख जाएँ, मतभेद भी संवाद बन जाएँ।
आलोचना मार्ग दिखाए, रिश्ते विश्वास से सज जाएँ।

मंच केवल रचना का नहीं, विचारों की पाठशाला है।
हर लेखनी अनुभव का दर्पण, हर टिप्पणी में उजाला है।

इसलिए संकल्प लें आज हम, पहले पढ़ेंगे, फिर कहेंगे।
पहले सम्मान देंगे, फिर अपेक्षा रखेंगे।

हो लेखनी सत्य, संवेदना, सौंदर्य से, हो सृजन प्रेम और प्रकाश से।
यही साहित्य की गरिमा है, यही मानवता का उल्लास है।
- जगदीश प्रसाद शर्मा
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
42 मिनट पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर