"श्रवण का संस्कार"
श्रवण केवल कान का काम नहीं, ये तो मन का संस्कार है।
उत्तर देने को जो सुने, वो शब्दों का व्यापार है।
समझने को जो सुने, वो दिल का उपहार है।
साहित्य भी यही कहता है, संवेदना ही सार है।
लेखक लिखता कम है, समाज की नब्ज़ को सुनता है।
मौन की भाषा पढ़ता है, अनकहे को शब्द देता है।
यदि धैर्य से सुनना सीख जाएँ, मतभेद भी संवाद बन जाएँ।
आलोचना मार्ग दिखाए, रिश्ते विश्वास से सज जाएँ।
मंच केवल रचना का नहीं, विचारों की पाठशाला है।
हर लेखनी अनुभव का दर्पण, हर टिप्पणी में उजाला है।
इसलिए संकल्प लें आज हम, पहले पढ़ेंगे, फिर कहेंगे।
पहले सम्मान देंगे, फिर अपेक्षा रखेंगे।
हो लेखनी सत्य, संवेदना, सौंदर्य से, हो सृजन प्रेम और प्रकाश से।
यही साहित्य की गरिमा है, यही मानवता का उल्लास है।
- जगदीश प्रसाद शर्मा
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