आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

युद्ध

                
                                                         
                            जब युद्ध
                                                                 
                            
किसी नशे के विरुद्ध
छेड़ा जाए
वाजिब
लगता है!
जब युद्ध ही
नशा बन जाए तो
मात खाजाती हैं
मान्यताएँ l
क्षुब्ध हो कर
मूर्च्छा में चली जाती हैं
संवेदनाएँ l
लहूलुहान
सिसकियाँ
छटपटाती हैं l
मछलीमार के काँटे से
बिंधी मछली की तरह
और
जीवन को नहीं
बल्कि
अधूरी मृत्यु को
पूर्ण करने की
भीख माँगती हैं l
-मधुश्री के.
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
2 घंटे पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर