खिड़की से आती धूप सी,
तल्ख़ियाँ रोज़ की पुरानी हैं,
दुख तो मामूली होते हैं,
ये बस जीने की निशानी हैं।
कभी किसी की बेरुखी,
कभी वक़्त का बेवक्त हो जाना,
कभी महलों का टूटकर,
रेत-सा फिसल जाना।
जब ज़मीं पाँवों से सरक जाए,
और आसमाँ टूटकर गिर जाए
तब सदमा सन्नाटा बनकर
जीवन को घेरने आए।
सुख निर्मम है शायद
स्मृतियों में पड़ा होता है।
दुख मामूली होते हैं
पर सदमा बड़ा होता है।
- कामिनी मोहन पाण्डेय
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