हिंदी फिल्मों में दान सिंह संगीतकार को बहुत कम लोग जानते होंगे। लेकिन 'वो तेरे प्यार का गम' गीत का संगीत आज भी लोगों की मुलाकात प्रेम में किस्मत के निराले अंदाज से कराता है। यह गीत जब तक गुनगुनाया जाएगा तब तक दान सिंह संगीत की दुनिया में महकते रहेंगे। दान सिंह का जीवन गुमनामी में व्यतीत हुआ। दान सिंह ने फिल्मी गानों की धुनें ही नहीं बनाई बल्कि कई कवियों की साहित्यिक रचनाओं को अपनी मधुर धुनों से सजाया है। यह कोई पांचवें दशक की बात है। इस दौरान दान सिंह दिल्ली आकाशवाणी में कंपोजर के रूप में काम करते थे।
कविता अलक-पलक श्यामल स्वर्णिम...की धुन बनानी थी...
इसी दौरान उन्हें महान कवि सुमित्रानंदन पंत की एक कविता अलक-पलक श्यामल स्वर्णिम...की धुन बनानी थी। और उसे गाना भी था। अखबारों में रोज छपने वाली आकाशवाणी के कार्यक्रमों की सूची में यह कार्यक्रम भी छपा। इसे देखकर पंत ने आकाशवाणी के केंद्र निदेशक को फोन किया-'यह कौन दान सिंह है जो मेरी रचना को गाएगा'। कोई सिख बच्चा है क्या? दरअसल पंत जी का कहना था कि उनकी रचना किसी अनुभवी व्यक्ति को गानी चाहिए, कल का छोरा इसे क्या गा पाएगा। केंद्र निदेशक ने उन्हें आश्वस्त किया कि उनकी रचना का गायन अच्छा ही रहेगा।
पंत का फोन आया गया- जिस बच्चे ने मेरी रचना का पाठ किया है...
बाद में दान सिंह ने आकाशवाणी में पंत की रचना का पाठ किया तो कुछ देर बाद ही आकाशवाणी में पंत का फोन आया गया- जिस बच्चे ने मेरी रचना का पाठ किया है, उसे रोककर रखें। मैं आकाशवाणी आ रहा हूं। दान सिंह को लगा कि शायद कहीं गड़बड़ी हो गई। वे डरते हुए पंत जी का इंतजार करते रहे। पंत जी आए और उन्होंने दान सिंह की पीठ थपथपाई। कहा-अभी मेरे साथ चलो। भोजन साथ ही करेंगे। वे दान सिंह को अपनी कार में बैठाकर घर ले गए और अपने साथ भोजन कराया।
साभार: वो तेरे प्यार का गम
संगीत का खोया सितारा दान सिंह
ईशमधु तलवार
राजकमल पेपर बैक्स
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2 वर्ष पहले
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