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कविता

                
                                                         
                            अकेलेपन की रात में, जब चाँद भी छुपा-सा लगे,
                                                                 
                            
ज़िम्मेदारियों की बोझिल राहें कभी-कभी टूटन जैसी लगें।

तब तुम्हारे शब्द पहली सुबह की रौशनी बनकर आए,
और थके हुए दिल में उम्मीद के दीप जलाए।


हर दर्द, हर ख़ामोशी तुम्हारी मुस्कान में पिघलने लगी,
रूह को फिर से जीने की वजह मिलने लगी।

जो बिखरा हुआ था भीतर कहीं,
धीरे-धीरे ख़ुद में सिमटने लगा।

तुम्हारे शब्द उसके दिल की आवाज़ बन गए,
उसकी ख़ामोशियों के हमराज़ बन गए।

और तब उसने जाना कि यह सफ़र किसी एक नज़र का नहीं,
न किसी चेहरे या किसी ख़्वाब का नहीं।

यह तो अपनी रूह तक पहुँचने की राह थी,
अपनी पहचान से मिलने की चाह थी।

दुनिया को समझते-समझते उसने यह जाना,
कि सबसे बड़ी तलाश किसी और की नहीं होती।

इंसान आख़िरकार उसी को ढूँढ़ता है,
जो बरसों से उसके अपने वजूद में छुपा होता है।
- कमरुन नदाफ
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
39 मिनट पहले

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