मैं पतझर का रुक्ष तना हूँ तुम वसंत की कोमल बेला
मैं भटका सा एक बटोही तुम हो एक सुहाना मेला
बँध भी गए प्रेम धागों में तो भी यह समझाओ मुझको
अपनी दो विपरीत दिशाएँ बोलो साथ निभेगा कैसे
मेरे आँगन में पसरी है बरसों से इक गहरी निद्रा
तुम उस महल भली पल्ली हो जहाँ नाचती चंचल मुद्रा
मैं खंडहर की मौन उदासी तुम उत्सव की मुखर रागिनी
मिल भी गई ताल अपनी तो गीत नया यह सजेगा कैसे
मेरे भाल लिखी है पीड़ा और विरह के शापित अक्षर
तुम्हें मिला है वरदानों सा नव उमंग से भरा मुकद्दर
मैं ठहरा शिव सा हलाहल तुम हो अमृत की जलधारा
घुल भी गए रंग दोनों के चित्र नया यह रचेगा कैसे
मेरा जन्म हुआ है जग में सूनेपन को मीत बनाने
तुम आई हो इस धरती पर हर चेहरे पर प्रीत सजाने
तुम हो ऊषा की अरुणाई मैं संध्या का ढलता सूरज
जुड़ भी गई क्षितिज पर रेखा तो यह समय थमेगा कैसे
इतनी सरल नहीं है दुनिया जो विपरीत दिशाएँ जोड़े
इतनी मुदित नहीं किस्मत जो अपने कड़े नियम को तोड़े
मिलना अपना एक स्वप्न है फिर भी मैं यह सोच रहा हूँ
अगर न हमने प्रेम किया तो यह संसार चलेगा कैसे
-भानु शर्मा रंज
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