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चाँद से माँगी थी बस..

                
                                                         
                            हसरतों का सिलसिला दिल से कभी जाता नहीं,
                                                                 
                            
वक़्त चाहे जो भी कर ले, इश्क़ मिट पाता नहीं।।

धूप ने लाखों दफ़ा झुलसा दिए अरमान सब,
फिर भी उम्मीदों का पौधा सूखकर जाता नहीं।।

हमने हर ठोकर को अपनी ज़िंदगी का सबक़ कहा,
हौसलों का कारवाँ कभी यूँ बीच में रुकता नहीं।।

चाँद से माँगी थी बस इक रात भर की रौशनी,
सुबह होते ही मगर कोई सितारा रहता नहीं।।

दिल की वीरानी में भी महकी वफ़ाओं की महक,
बेवफ़ाई का धुआँ हर घर में टिक पाता नहीं।।

हसरतें जब भी दुआ बनकर लबों तक आ गईं,
रब किसी सच्चे दिलों को यूँ ही तड़पाता नहीं।।

'एमके सिंह' रख यक़ीं अपनी क़लम की रोशनी पर,
सच्चे अल्फ़ाज़ों का जादू देर तक छुपता नहीं।।

 
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5 घंटे पहले

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