राखी
मैं राखी भेजती नहीं, भाइयों ने मुझसे झगड़ा किया था
घर बुलाकर बेइज्जत किया था ।
बंद किया था दरवाजों को
अपने कुकृत्यों को ढँकने को।
सारी संपत्ति हड़पने को
मांँ-पिता को सताने को।
प्रतिद्वंदी मुझे माना उन्होंने
मैंने कुछ नहीं बिगाड़ा था ।
रो-धोकर चली आई थी
सब कुछ पीछे छोड़ आई थी ।
कर सकती थी बहुत कुछ
दिल में दाह सुलगती रही।
ईश्वर के दरबार में है अर्जी
न्याय हो, तेरा भी मेरा भी।
राखियों का किया अपमान
तिल भर भी रखा न मान
इशारा किया था जरूरत नहीं
तेरे लिए यहांँ फुर्सत नहीं
अब मैं राखी भेजती नहीं, टूटे रिश्तों को ढोती नहीं।
अपमान की उसे देहरी पर स्वाभिमान खोती नहीं ।।
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