सामना हुआ जिंदगी से लड़खड़ाने लगे
क्या कब कैसे क्यों में तड़पने लगे
अच्छा बुरा कभी सोचा ही नहीं
टूटते हुए अपनों को संभाला ही नहीं
कैसी दशा आंगन की हुई
झांक कर आएने में देखा ही नहीं
मां की ममता और पिता की सोच
बेटी के सपने और बेटे की ओर
पराए हुए अपने कारण ना पूछा
टूटी हुई छत की बूंदों का ख्याल
गूंजती किलकारी का अनोखा दुलार
रहा अनजान माया की दुनिया में
भरता रहा तिजौरी भोग के इंतजार में
सोना चांदी हीरे जवाहरात
हुआ पागल इनकी चकाचौंध में
सबकुछ कमाया फिर भी गंवाया
मुश्किल समय हाथ ना आया
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