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"पीड़ा का पारावार"

                
                                                         
                            जब जीवन की धूप अचानक
                                                                 
                            
दग्ध अग्नि-सी बन जाती है,
और हृदय की भीतरी धरती
दुःख के शूल उगाती है—
तब मनुष्य टूटता कम है,
कुछ भीतर से बदलता है,
वेदना के तीखे स्पर्शों में
एक नया सत्य पनपता है।

दर्द जब सीमा से आगे
अपना विस्तार बढ़ाता है,
तब मन का संचित आकर्षण
धीरे-धीरे झर जाता है।
जो बंधन थे स्वर्णिम जैसे,
वे तिनकों-से हल्के होते,
आत्मा के निःशब्द प्रांगण में
मुक्ति के दीपक जलते।

कल तक जो अत्यंत समीप था,
प्राणों का आधार लगा,
आज वही धुँधली स्मृति-सा
मन के आकाश में जगा।
दृष्टि बदलती है जब भीतर,
जग का रूप बदल जाता,
माया के रंगीन आवरण से
सत्य स्वयं बाहर आता।

आसक्ति की ऊँची दीवारें
एक-एक कर ढह जाती हैं,
अहंकार की कठोर शिलाएँ
रेत-सी बिखर जाती हैं।
तब शून्य नहीं, अपितु भीतर
गहरी शांति उतरती है,
मानो पीड़ा की अँधेरी रात
प्रभात में बदलती है।

वेदना की तीखी धारा
मन के जाल बहा ले जाती,
स्मृतियों के बोझिल पत्थर
धीरज में गलने लग जाते।
तब आत्मा का निर्मल जल
धीरे-धीरे झलक उठे,
जैसे किसी तपस्वी वन में
अंतरदीप प्रज्वलित उठे।

जो कुछ अपना समझा था,
वह केवल छाया भर था,
जिसे पकड़ने में जीवन
अनगिन बार व्यर्थ गया।
पीड़ा ने आकर सिखलाया—
बंधन सब क्षणिक कहानी,
सच्चा धन तो भीतर सोयी
स्वतंत्रता की है निशानी।

तब ज्ञात हुआ—दुःख केवल
घावों की भाषा नहीं,
वह तो गूढ़ संकेत किसी
आंतरिक अभिलाषा का है।
वह मन को जगाता है
नींद भरे मोह-जालों से,
और आत्मा को ले जाता
निर्भय सत्य-प्रकाशों में।

अतः जब जीवन में आए
वेदना का गहन अंधेरा,
समझो वह मार्ग दिखाने
आया है मौन सवेरा।
पीड़ा केवल पीड़ा नहीं—
वह गुप्त विमोचन-द्वार है,
जिसके पार मनुष्य स्वयं
अपने से ही साक्षात्कार है।
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एक घंटा पहले

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