विषय—
जैसे कोई प्राचीन शिला,
जिस पर समय की उँगलियों ने
अनगिन लिपियाँ उकेरी हैं,
पर हर स्पर्श में
एक अनकहा शेष रहता है।
मैं जब उसे देखता हूँ,
वह वैसा नहीं रहता
जैसा ग्रंथों में वर्णित है—
मेरी दृष्टि की धूप
उस पर एक नया रंग धर देती है,
अर्थ का एक ताज़ा कंपन।
क्या पुराना केवल वह है
जो जड़ हो गया हो?
या वह भी पुराना है
जो हर बार
नए प्रश्नों से काँप उठता है?
शब्द वही रहते हैं,
पर उनके बीच की निःशब्दता
बदल जाती है—
और वहीं से जन्म लेती है
एक नई व्याख्या,
एक अनपहचाना आलोक।
अनुभव,
जैसे किसी नदी का गुप्त संगम,
जहाँ स्मृति और वर्तमान
एक-दूसरे में घुलकर
विषय को पुनः रचते हैं।
मैंने पाया है—
नवीनता बाहर नहीं,
वह भीतर के विस्फोट में है,
जहाँ दृष्टि अपनी सीमाएँ तोड़कर
वस्तु को फिर से गढ़ती है।
इसलिए
किसी भी कथन को अंतिम मत मानो—
हर निष्कर्ष
एक आरंभ की देहरी है,
जहाँ से अर्थ
फिर यात्रा पर निकलता है।
और इस यात्रा में
पुराना कभी पुराना नहीं रहता,
वह केवल प्रतीक्षा करता है—
किसी नई आँख,
किसी नए मन,
किसी नए उद्घाटन की।
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