आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

"पुनः उद्घाटित अर्थ"

                
                                                         
                            विषय—
                                                                 
                            
जैसे कोई प्राचीन शिला,
जिस पर समय की उँगलियों ने
अनगिन लिपियाँ उकेरी हैं,
पर हर स्पर्श में
एक अनकहा शेष रहता है।

मैं जब उसे देखता हूँ,
वह वैसा नहीं रहता
जैसा ग्रंथों में वर्णित है—
मेरी दृष्टि की धूप
उस पर एक नया रंग धर देती है,
अर्थ का एक ताज़ा कंपन।

क्या पुराना केवल वह है
जो जड़ हो गया हो?
या वह भी पुराना है
जो हर बार
नए प्रश्नों से काँप उठता है?

शब्द वही रहते हैं,
पर उनके बीच की निःशब्दता
बदल जाती है—
और वहीं से जन्म लेती है
एक नई व्याख्या,
एक अनपहचाना आलोक।

अनुभव,
जैसे किसी नदी का गुप्त संगम,
जहाँ स्मृति और वर्तमान
एक-दूसरे में घुलकर
विषय को पुनः रचते हैं।

मैंने पाया है—
नवीनता बाहर नहीं,
वह भीतर के विस्फोट में है,
जहाँ दृष्टि अपनी सीमाएँ तोड़कर
वस्तु को फिर से गढ़ती है।

इसलिए
किसी भी कथन को अंतिम मत मानो—
हर निष्कर्ष
एक आरंभ की देहरी है,
जहाँ से अर्थ
फिर यात्रा पर निकलता है।

और इस यात्रा में
पुराना कभी पुराना नहीं रहता,
वह केवल प्रतीक्षा करता है—
किसी नई आँख,
किसी नए मन,
किसी नए उद्घाटन की।
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
एक घंटा पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर