जीवन—
क्षणों का एक अस्थिर संकलन,
जिसे हम स्थायित्व का भ्रम देकर
अपनी ही दृष्टि में
दीर्घ बना लेना चाहते हैं।
पर समय,
किसी का अनुचर नहीं होता—
वह निरंतर बहता है,
और अपने प्रवाह में
स्मृतियों के भी किनारे घिसता रहता है।
तभी कोई,
शब्दों में अपनी उपस्थिति दर्ज करता है—
न कि केवल कहने के लिए,
बल्कि उस अनकहे को छूने के लिए
जो भीतर
अदृश्य रूप से जलता है।
ऐसे शब्द,
कागज़ पर नहीं टिकते,
वे चेतना में उतरते हैं—
और युगों के अंतराल में भी
अपना अर्थ खोज लेते हैं।
वहीं कुछ जीवन,
स्वयं एक मौन लेखन होते हैं—
जिनमें कर्म,
वाक्यों का कार्य करते हैं,
और त्याग,
उनका विराम चिह्न बन जाता है।
उनका अस्तित्व,
किसी कथा का आश्रित नहीं होता,
बल्कि कथा ही
उनके पदचिन्हों का अनुसरण करती है—
धीरे-धीरे,
श्रद्धा के साथ।
अमरता,
किसी उपलब्धि का नाम नहीं—
वह तो उस स्पर्श का परिणाम है
जो समय के पार जाकर भी
अनुभव में बना रहता है।
इसलिए मनुष्य,
या तो अपने शब्दों में जीवित रहता है,
या अपने जीवन में—
पर यदि दोनों में सत्य हो,
तो वह स्वयं
काल का अतिक्रमण बन जाता है।
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